'कठपुतली मत बनो'



हर मनुष्य एक कठपुतली की तरह है जब तक स्वविवेक से वह काम नहीं लेता. उसका मष्तिक उसके ख़ुद के द्वारा इतना संचालित नहीं होता जितना कि दूसरों से होता है।आप सोच रहे होंगे कैसे ?
तो देखिए-आपने किसी बन्दे की तारीफ़ की बन्दा ख़ुश हो गया।ख़ुशी से नाचने लगा । कृतज्ञ हो गया। अगले ही पल आपको उसकी कोई बात या कोई हरक़त पसंद नहीं आई तो आपने उसकी आलोचना कर दी । वही बंदा आपको भली-बुरी सुनाने लग जाता है। उसकी त्यौरियाँ चढ़ जाती हैं ।
 
आप किसी को घूर के देखोगे वो गुस्से से आग-बबूला हो जाएगा । बड़ -बड़ शुरू कर देगा।आप किसी को प्यार से 
देखोगे वो आपका मित्र हो जाएगा । आपको पसंद करने लगेगा ।अगला कोई वजह नहीं बताएगा क्रोध की,अपनत्व की
आप उसकी भाव -भंगिमाओं से उसकी प्रतिक्रियाओं से संचालित होते रहोगे और आपको पता भी नहीं चलेगा कि 
कब आप अगले के हाथों कुठपुतली बन गए इसलिए कठपुतली बनना छोड़िए और अपनी बुद्धि ,अपने विवेक से अपने दिमाग को स्व नियंत्रण में रखिए। 

अपने को पहले तो स्वच्छ मन का बनाइए ताकि आपके प्रति किसी का नकारात्मक रवैया भी हो तो आप उससे प्रभावित नहीं हों क्योंकि हमे दूसरा तभी नचा पाएगा जब हम खुद अपने व्यक्तित्त्व से अप्रभावित और असंतुष्ट होंगे। हम अगर खुद को अच्छाइयों से भर लेंगे तो दूसरा हमे बुरा सिद्ध करने का प्रयास करते करते थक जाएगा पर हम उसे स्वीकार ही नहीं करेंगे।
हम जो होते हैं उसी भाव को स्वीकार करते हैं.हमारे अंदर कोई कमज़ोरी है और उससे सम्बंधित कोई चर्चा होती है तो हम उसे दिल पर ले लेंगे क्योंकि हम स्वं  को उस जगह रख कर देखेंगे। 
इसलिए स्वं में भीतरी सुधार कीजिए और हर व्यक्ति की आलोचना से खुद को अप्रभावित कर लीजिए। सम भाव रखना है.ना ही बुराई से प्रभावित होना है ना ही बड़ाई से.

अब आप सोच रहेंगे होंगे ये ही मुश्किल काम तो नहीं होता. तो जनाब यही मुश्किल काम तो करने आए हैं मनुष्य जन्म लेकर। लगे रहो प्रयास में.

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