अज़ीब निषेध
कुछ अटपटी परम्पराएँ ,थोपे हुए अनर्थक विचार , पारंपरिक निषेध (टैबूज ) ने हमारे समाज ,हमारी संस्कृति में ऐसी पैठ जमा ली है कि कोई भी सुधारक ,कोई भी प्रगतिशील विचारों का प्राणी चाहकर भी इन्हें समाज से दूर नहीं कर पा रहा है । कहने को तो देश प्रगतिशील हो रहा है । स्त्री के अधिकारों की ,उसके सम्मान आदि की भी ख़ूब बातें की जा रही हैं । लेकिन क्या इनमे कुछ सच्चाई है ?शायद नहीं । आज भी समाज में अजीबो-ग़रीब परम्पराएँ ,और कुछ निषेध व्याप्त हैं । जिनके पीछे कोई तर्क ,कोई वैज्ञानिकता नहीं है । सबसे ज़्यादा विवाद और चिंता का विषय है आधुनिक और सुलझे हुए विचारों के माने जाने लोगों द्वारा भी रजस्वला स्त्री के प्रति वही दक़ियानूसी ,अवैज्ञानिक सोच । उनका ये मानना कि इन दिनों स्त्री अपवित्र होती है । उसे घर का खाना नहीं बनाना चाहिए ,अचार को हाथ नहीं लगाना चाहिए,पूजा नहीं करनी चाहिए आदि -आदि । आखिर इन मान्यताओं के पीछे क्या कोई सटीक तर्क है ,नहीं । सब निरर्थक है । ये एक 'नेचुरल फिनोमिना है '। इसमें अशुद्ध जैसा ,या गंदगी जैसी कोई चीज़ नहीं है । ये स्त्री की सम्पूर्णता का प्रतीक है । बीज -उत्पत्ति और सृष्टि की निरंतरता के लिए एक आवश्यक प्रक्रिया है । रजस्वला स्त्री का घर की रसोई में प्रवेश वर्जित कर देना बड़ा ही शोचनीय विषय है । कितनी अजीब बात है कि कुछ लोग ऐसे में बाहर ' खाना 'खाना पसंद करते हैं । घर में सभी स्त्री एक ही डेट पर रजस्वला हो जाएं तो तो मटके का पानी पीने के लिए या इस तरह की अन्य मदद के लिए या तो पड़ौसी का मुँह ताकना होगा या फिर बाहर से कोई इंतज़ाम करने होंगे । जैसे के घर में कोई महा -संक्रामक बीमारी से ग्रसित हो गया हो । ये कैसी सोच है । अरे यूँ तो वैज्ञानिक तरीके से सोचा जाए तो कोई भी इंसान भौतिक दृष्टि से पवित्र नहीं है । हर इंसान के शरीर में मल -मूत्र, रुधिर आदि विद्यमान होते ही है । जब तक ये चीज़ शरीर के भीतर हैं तो इंसान शुद्ध है और बाहर आते ही अपवित्र हो जाता है । इंसान शौच कार्य करने के बाद हाथ धोते ही स्वच्छ हो जाता है जबकि स्त्री इन दिनों में हर स्थिति में अपवित्र ही रहती है । जरा सोचिए कहाँ तक सही है ये सोच । यदि किसी लड़की के 'पीरियड 'शुरू न हो तो ये भी चिंता का विषय हो जाता है और शुरू हों तो उसे अछूतों जैसा व्यवहार मिलता है । उसे तो हर परस्थिति में ही उपेक्षित]होना है । इन सोच के पीछे कारण शायद ये रहे होंगे कि इन दिनों वह स्त्री पर्याप्त आराम कर ले । अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख ले । अपनी स्वच्छता का ,इन्फेक्शन आदि का पूरा ध्यान रख पाए । लेकिन इन विचारों को ग़लत तरीके से समाज में पेश किया गया । इनको ग़लत अर्थों में लिया गया और ये ग़लत आदते,परम्परांए बन गई जिन्हें हर कोई ढो रहा है । पर्दा -प्रथा ,बहू को अपने से नीचे स्थान पर बैठने के लिए कहना ,ससुर के सामने बात न करना आदि ऐसी कई अर्थ -हीन परम्पराएँ और निषेधात्मक कर्म समाज में कई पढ़े-लिखे व आधुनिक विचारों के लोग भी झेल रहे हैं।

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