जाती रही ज़हानत
जाती रही ज़हानत खतायें करते -करते
वो हो गये हैं आदी, सज़ाए भरते -भरते ।
है अय्यारी ही अब तो अदा में ,हर करम में
मुंसिफ़ी में उनकी आस्था कहाँ है
गुज़र रही है उम्र उनकी ,धर्म छलते-छलते ।
ग़ायब है शफ़क़त दिल से, ज़हन से
ये ख़यानत का असर है ,बेनूर हो गए हैं
ख़ुश- शक्ल बनते -बनते ।
पकड़ के हाथ हमसफ़र का ,छोड़ गए बीच राह
बदनियत हो गए हैं आवारगी करते -करते ।
वो नादान हमसफ़र उसका ,खा कर भी धोख़ा उससे
नहीं बाज़ आ रहा है वफ़ा करते -करते ।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed