'आलोचना '
आलोचना सफलता के लिए उतनी ही जरूरी है, जितनी पौधे के लिए खाद । इसलिए इसकी आदत डाल लीजिए । इससे घबराने की नहीं बल्कि इससे ऊर्जा पाने की और अपनी गलती सुधारने की कोशिश कीजिए । आप ये जान लीजिए कि आप जितने सफल होते जाएँगे आपके आलोचक उतने ही बढ़ते जाएँगे । क्योंकि ईर्ष्या उसी से होती है जिसमे हमें कुछ दमदार दिखता है । हम जिसके सामने कहीं न कहीँ ख़ुद को छोटा मानने लगते हैं ।
आलोचक भी दो तरह के होते हैं -एक वो जो अनावश्यक त्रुटि निकालने में विश्वास करते हैं और तुम्हारा मनोबल गिराना चाहते हैं । एक वो जो तुम्हे और मंझा हुआ और ज़्यादा कुशल देखना चाहते हैं । किस तरह के आलोचक ज़्यादा अच्छे होते हैं ये आप ख़ुद समझ सकते हैं । लेकिन प्रथम तरह के आलोचकों से भी हम खुद को और अधिक दृढ और स्वयं को भीतर से मज़बूत बनाने का सबक सीख सकते हैं ।
इन अर्थों में हमे अपनी सफलता के लिए आलोचकों की बहुत ज़रूरत होती है । इसलिए आपके आस-पास यदि आलोचकों की भरमार है
तो खुश हो जाइये । उनका स्वागत कीजिए और स्वं को सफल होने के लिए तैयार करते रहिए ।

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