'जिस दिन 'बाई 'नहीं आती '




मन व्याकुल सा रहता  है, रात को नींद नहीं आती

दुश्वारी में दिन जाता है, जिस दिन बाई नहीं आती ।

पड़े सिंक में बर्तन भी, मुझको मुँह चिढ़ाते हैं

छोटे-बड़े ये भाँति -भाँति के, उस दिन मुझे नहीं भाते हैं ।

चम्मच ,करछी ,तवा ,कढ़ाई बड़ा शोर मचाते हैं

मन की खीझ कहाँ छुपती है बस कूँचा घिसते जाते हैं 

घनत्व झाड़ू का कम लगता है ,पोछे की बारी नहीं आती 

घर बहुत बड़ा लगता है जिस दिन बाई नहीं आती। 





मन की खीझ कहाँ छुपती है ,बस कूचा घिसते जाते हैं ।

घनत्व झाड़ू का कम लगता है ,पोछे की बारी नहीं आती


घर बहुत बड़ा लगता है ,जिस दिन बाई नहीं आती । । 

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